दरभंगा की यह खबर सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि उस दर्दनाक हकीकत की तस्वीर है, जिसमें पढ़े-लिखे युवा धीरे-धीरे टूटते हैं — बिना शोर किए, बिना शिकायत किए। लहेरियासराय थाना क्षेत्र के मदारपुर मोहल्ले में 26 वर्षीय MBA पास युवक अभिषेक कुमार राय ने अपने ही घर में फांसी लगाकर जीवन खत्म कर लिया।

जिस घर में उम्मीदें थीं, वहीं पसरा सन्नाटा
घटना के बाद मदारपुर मोहल्ला खामोश है। हर चेहरा सवाल पूछ रहा है, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं। अभिषेक का कमरा अब बंद है, लेकिन उसके भीतर अधूरे सपनों की गूंज बाकी है।
पढ़ाई पूरी की, संघर्ष शुरू हुआ
अभिषेक ने MBA की पढ़ाई पूरी की थी। परिवार को उम्मीद थी कि वह जल्द ही नौकरी पाएगा और अपने पैरों पर खड़ा होगा। लेकिन डिग्री के बाद जो सफर शुरू हुआ, वह इंटरव्यू, रिजेक्शन और इंतज़ार में ही उलझकर रह गया।
तीन साल तक नौकरी की तलाश करते-करते अभिषेक मानसिक रूप से टूटता चला गया। बाहर से वह सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर एक खामोश जंग चल रही थी।
छोटा भाई बना अफसर, बड़ा भाई खुद से हार गया
परिवार में किसी ने उस पर दबाव नहीं डाला। लेकिन हालात खुद तुलना करने लगे। छोटा भाई BPSC परीक्षा पास कर सरकारी शिक्षक बन चुका था। घर में जश्न था, मगर अभिषेक की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
उसके चाचा बताते हैं,
“वह कहता था—सब आगे बढ़ गए हैं, मैं ही पीछे रह गया हूं।”
रात का सन्नाटा और टूटी हुई उम्मीद
घटना वाली रात अभिषेक अपने कमरे से नीचे नहीं आया। मोबाइल फोन भी बार-बार कॉल करने पर नहीं उठा। परिजनों को जब अनहोनी का शक हुआ, तो वे दूसरी मंजिल पर पहुंचे।
दरवाजा अंदर से बंद था। काफी देर तक आवाज देने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला। जब दरवाजा तोड़ा गया, तो सामने वह दृश्य था, जिसे परिवार कभी भूल नहीं पाएगा — मफलर के सहारे पंखे से लटका अभिषेक।
कोई सुसाइड नोट नहीं, लेकिन बहुत कुछ कह गई खामोशी
कमरे से कोई सुसाइड नोट बरामद नहीं हुआ। लेकिन किताबें, फाइलें और दीवार पर टंगी MBA की डिग्री बहुत कुछ बयां कर रही थीं। यह आत्महत्या नहीं, बल्कि धीरे-धीरे घुटते सपने की मौत थी।
पुलिस का कहना
लहेरियासराय थानाध्यक्ष अमित कुमार ने बताया कि प्रथम दृष्टया मामला आत्महत्या का है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। परिजनों ने किसी तरह के विवाद या दबाव की बात नहीं कही है।
बेरोजगारी का अदृश्य जाल
अभिषेक की मौत ने उस मुद्दे को फिर सामने ला दिया है, जिस पर समाज अक्सर चुप रहता है। पढ़े-लिखे युवाओं पर बेरोजगारी का मानसिक दबाव, तुलना की पीड़ा और “खुद को साबित करने” की मजबूरी कई बार जानलेवा बन जाती है।
मोहल्ले के एक बुजुर्ग कहते हैं,
“वह रोज़ मुस्कुराता था, किसी को क्या पता था कि वह अंदर से टूट चुका है।”
अंत में एक सवाल
आज अभिषेक नहीं है, लेकिन उसका सवाल बाकी है—
क्या डिग्री लेने के बाद भी अगर रास्ता न मिले, तो जिम्मेदारी किसकी है?
यह सिर्फ एक परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे समाज की हार है।







