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सड़कें बनीं जानलेवा, 7 साल में 50 हजार मौतें

February 18, 20261 Mins Read
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बिहार में सड़क सुरक्षा को लेकर हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं। पिछले सात वर्षों में सड़क दुर्घटनाओं में 50 हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। यह आंकड़ा राज्य की सड़कों की स्थिति और यातायात व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सोमवार को बिहार विधान परिषद की कार्यवाही के दौरान यह मुद्दा जोर-शोर से उठा, जहां सदस्यों ने सरकार से जवाब मांगा कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में हो रही मौतों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता

निर्दलीय विधान पार्षद महेश्वर सिंह ने पूर्वी चंपारण जिले में बढ़ते सड़क हादसों को लेकर तारांकित प्रश्न के माध्यम से सरकार से जवाब तलब किया। उन्होंने विशेष रूप से मोतिहारी जिले का जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 2025 में ही 393 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में हुई है। उन्होंने सदन में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2019 से 2026 के बीच राज्य में कुल 50,941 लोगों की जान सड़क हादसों में गई है। इतना ही नहीं, लगभग 44 हजार लोग गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं।

सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन मृतकों में लगभग आधे लोग 18 से 35 वर्ष आयु वर्ग के थे। यानी राज्य की युवा आबादी का बड़ा हिस्सा सड़क हादसों की भेंट चढ़ रहा है। यह स्थिति न केवल सामाजिक दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी गंभीर है, क्योंकि यही आयु वर्ग राज्य की कार्यशील और उत्पादक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

सरकार का जवाब: 1,044 ब्लैक स्पॉट चिन्हित

महेश्वर सिंह के सवाल का जवाब देते हुए पथ निर्माण विभाग के मंत्री दिलीप जायसवाल ने स्वीकार किया कि राज्य में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार इस समस्या को गंभीरता से ले रही है और पूरे राज्य में 1,044 स्थानों को ‘ब्लैक स्पॉट’ के रूप में चिन्हित किया गया है।

ब्लैक स्पॉट वे स्थान होते हैं, जहां बार-बार सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और जिनमें जान-माल का भारी नुकसान होता है। मंत्री ने बताया कि इन स्थानों पर विभागीय स्तर पर सुधारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं। सड़क डिजाइन में बदलाव, संकेतक बोर्ड की स्थापना, स्पीड ब्रेकर, रिफ्लेक्टर और अन्य सुरक्षा उपाय लागू किए जा रहे हैं।

इसके अलावा, राज्य स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की भी योजना है। मंत्री ने कहा कि केवल सड़क बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। जरूरत पड़ने पर ज़ेब्रा क्रॉसिंग की संख्या बढ़ाई जाएगी और संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त सुरक्षा संकेत लगाए जाएंगे।

अटल पथ पर गरमाई बहस

सदन में चर्चा का केंद्र बना राजधानी का चर्चित मार्ग अटल पथ। कांग्रेस के विधान परिषद सदस्य मदन मोहन झा ने सवाल उठाया था कि क्या अटल पथ देश की सबसे असुरक्षित सड़कों में शामिल हो गया है? हालांकि उनके अनुपस्थित रहने पर यह सवाल कांग्रेस सदस्य समीर कुमार सिंह ने उठाया।

समीर कुमार सिंह ने कहा कि अटल पथ पर आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। दिन हो या रात, अक्सर हादसों की खबरें सामने आती रहती हैं। उन्होंने सरकार से पूछा कि क्या वहां गति नियंत्रण की कोई प्रभावी व्यवस्था है? क्या वहां लगाए गए सुरक्षा उपाय पर्याप्त हैं, या फिर यह सड़क ‘डेथ ट्रैप’ में बदलती जा रही है?

फुट ओवर ब्रिज का नहीं हो रहा उपयोग

मंत्री दिलीप जायसवाल ने जवाब में कहा कि अटल पथ का निर्माण निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप किया गया है। वहां सर्विस रोड, साइन बोर्ड और फुट ओवर ब्रिज जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। लेकिन समस्या यह है कि लोग फुट ओवर ब्रिज का उपयोग नहीं करते। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उन्होंने बताया कि दिनभर में केवल 5 से 10 लोग ही ओवरब्रिज का इस्तेमाल करते हैं, जबकि अधिकतर लोग सीधे सड़क पार करते हैं, जिससे दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है।

मंत्री ने कहा कि केवल सरकार की जिम्मेदारी तय कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। यातायात नियमों का पालन नागरिकों को भी करना होगा। तेज रफ्तार, लापरवाही और नियमों की अनदेखी सड़क हादसों के प्रमुख कारण हैं।

बढ़ती रफ्तार, घटती सावधानी

विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में सड़कों के विस्तार और वाहनों की बढ़ती संख्या के साथ सड़क सुरक्षा उपायों का अनुपातिक विकास नहीं हो पाया है। हेलमेट और सीट बेल्ट का उपयोग अब भी व्यापक स्तर पर नहीं हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो ट्रैफिक नियमों के प्रति जागरूकता और भी कम है।

इसके अलावा, कई जगहों पर सड़क निर्माण के दौरान उचित संकेतक नहीं लगाए जाते या समय के साथ वे खराब हो जाते हैं। रात के समय रोशनी की कमी भी दुर्घटनाओं का कारण बनती है।

आगे की राह

सदन में हुई चर्चा ने यह स्पष्ट कर दिया कि सड़क सुरक्षा अब केवल एक विभागीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह जन-जीवन से जुड़ा बड़ा सामाजिक प्रश्न बन चुका है। सरकार ने ब्लैक स्पॉट चिन्हित करने और वहां सुधारात्मक कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन यह देखना होगा कि इन कदमों का प्रभाव जमीनी स्तर पर कितना दिखाई देता है।

सड़क हादसों में 50 हजार से अधिक मौतों का आंकड़ा केवल संख्या नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के उजड़ने की कहानी है। अगर ठोस और समन्वित प्रयास नहीं किए गए, तो यह आंकड़ा और भी भयावह रूप ले सकता है।

बिहार में सड़क सुरक्षा को लेकर अब केवल घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। जरूरत है कड़े अमल, तकनीकी सुधार और जन-जागरूकता के व्यापक अभियान की, ताकि सड़कों पर चलना मौत का सफर न बने।

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