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बिहार में कचरे का संकट: शहरों में कूड़े के पहाड़, प्रदूषण और बीमारियां बढ़ीं

January 29, 20261 Mins Read
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बिहार में ठोस कचरा प्रबंधन की समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है। राज्य के 261 शहरों में जगह-जगह कूड़े का अंबार नजर आता है, जो अब कई जगह पहाड़ जैसी ऊँचाई तक पहुँच गया है। सड़कों के किनारे, नदियों के तटों, रेलवे ट्रैकों के पास और खाली जमीनों पर कचरे के ढेर लगाए जा चुके हैं। यह सिर्फ शहरों की सूरत खराब नहीं कर रहा बल्कि आसपास के निवासियों के लिए गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय खतरा भी पैदा कर रहा है।

राज्य सरकार ने समय-समय पर कचरा संग्रहण और निस्तारण के लिए योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन अधिकांश योजनाएँ जमीन पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं। क्लस्टर आधारित कचरा प्रबंधन का मॉडल भी अभी तक सफल नहीं हो पाया। कई शहरों में कचरा प्रसंस्करण इकाइयाँ बनी हैं, लेकिन उनमें से अधिकतर चालू नहीं हैं। छोटे शहरों में जमीन की कमी और तकनीकी सुविधाओं की कमी के कारण कचरा प्रबंधन लगभग ठप है।

पटना का मामला इसी का उदाहरण है। बैरिया इलाके में 24 वर्षों में कचरा निस्तारण प्लांट चालू नहीं हो पाया है, जिससे वहाँ कचरे का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है। गया में प्रतिदिन 450 मीट्रिक टन कचरा उत्पन्न होता है और उसका निस्तारण करने के लिए कोई पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है। वैशाली, गोपालगंज, नालंदा, सारण, कैमूर और सीवान में अब तक कचरा निस्तारण प्लांट स्थापित नहीं हो सका है। वहीं, नवादा, भोजपुर, औरंगाबाद और रोहतास में प्लांट निर्माण प्रक्रिया अभी चल रही है। इन सभी शहरों में कचरा प्रबंधन की स्थिति बेहद असंतोषजनक है।

बिहारशरीफ, जो कि एक स्मार्ट सिटी है, वहां भी रिसाइक्लिंग प्लांट की कमी के कारण सात स्थानों पर कचरे के ढेर बन चुके हैं। भभुआ में सेनेटरी लैंडफिल के लिए जमीन पर विवाद चल रहा है। सीवान में भी डंपिंग के लिए भूमि उपलब्ध नहीं है। बिहारशरीफ के आनंद पथ के डॉ. राजीव रंजन का कहना है कि गंदगी और मच्छरों की वजह से बरसात के मौसम में डेंगू और अन्य बीमारियों के मामले बढ़ जाते हैं। कचरे से निकलने वाली दुर्गंध और धुआँ स्थानीय लोगों के लिए गंभीर परेशानी का कारण बनता है।

नगर विकास विभाग के अनुसार, राज्य के अधिकतर शहरों में कचरा प्रसंस्करण हो रहा है। राज्य के सभी निकायों में प्रतिदिन लगभग 6519 टन कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से केवल 2093 टन यानी करीब 32 प्रतिशत का ही प्रसंस्करण हो पा रहा है। बड़े शहरों में प्लांट लग चुके हैं, लेकिन छोटे शहरों में कचरा प्रबंधन में कई अड़चनें हैं।

उदाहरण के लिए, पटना में प्रतिदिन 938 टन, गया में 503 टन, भागलपुर में 229 टन में से 92 टन, मुजफ्फरपुर में 207 टन में से 47 टन और बिहारशरीफ में 178 टन में से केवल 23 टन कचरे का निस्तारण किया जा रहा है। अन्य शहरों में भी प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने की प्रक्रिया जारी है। कचरे का उठाव तो सभी निकाय कर रहे हैं, लेकिन निस्तारण और वैज्ञानिक प्रबंधन में अब भी काफी सुधार की जरूरत है। छोटे निकायों के लिए क्लस्टर आधारित प्रबंधन लागू करने का प्रयास हो रहा है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है।

पूर्वी बिहार, कोसी और सीमांचल क्षेत्र के शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन व्यवस्था बेहद कमजोर है। सुपौल में एमआरएफ सेंटर की योजना अटकी हुई है। भागलपुर में प्लांट चालू नहीं है। मधेपुरा में कचरा निस्तारण इकाई अभी भी शुरू नहीं हो सकी है। खगड़िया में जमीन की कमी, पूर्णिया में भूमि चयन की प्रक्रिया और अररिया में अधूरी निर्माण प्रक्रिया जैसी समस्याओं के कारण कचरा निस्तारण ठप है।

उत्तर बिहार के प्रमुख शहरों की स्थिति भी चिंताजनक है। मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, बेतिया, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी और सीतामढ़ी में करोड़ों रुपये खर्च करने और नगर निकायों को अपग्रेड करने के बावजूद धरातल पर योजनाएं विफल साबित हो रही हैं। इन शहरों में कचरा निस्तारण प्लांट या तो अस्तित्व में नहीं हैं या उपयोग नहीं हो रहे। मुजफ्फरपुर में तीन साल से निस्तारण ठप है, एमआरएफ प्रोसेसिंग प्लांट का टेंडर प्रक्रिया में फंसा है। मोतिहारी और बेतिया में स्थायी जमीन नहीं है। समस्तीपुर, दरभंगा और मधुबनी में सरकारी जमीन न मिलने के कारण कचरा शहर के भीतर ही जमा हो रहा है।

राज्य के अधिकांश शहरों में कचरा प्रबंधन का आंकड़ा इस प्रकार है:

प्लांट नहीं: सुपौल, मधेपुरा, अररिया, खगड़िया, जमुई, लखीसराय, मुंगेर, बांका, वैशाली, गोपालगंज, नालंदा, सारण, कैमूर, सीवान, मुजफ्फरपुर, पश्चिम चंपारण, दरभंगा, शिवहर।

प्लांट पर निस्तारण नहीं हो रहा: सहरसा, किशनगंज, भागलपुर, समस्तीपुर, मोतिहारी, मधुबनी।

कचरे का निस्तारण हो रहा: कटिहार, पूर्णिया, किशनगंज, सीतामढ़ी।

निस्तारण के लिए प्लांट बन रहा: नवादा, भोजपुर, औरंगाबाद, रोहतास।

कचरे के बढ़ते ढेर के कारण लोगों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। कचरे से निकलने वाला दुर्गंध और धुआँ सांस लेने में परेशानी पैदा करता है। डेंगू, मलेरिया, डायरिया और त्वचा रोग जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। बरसात के समय सड़ा हुआ कचरा नालियों में बहकर जलजमाव पैदा करता है, जिससे मच्छर और मक्खियों की संख्या बढ़ जाती है। साथ ही, खेतों की उर्वरता में गिरावट और भूजल प्रदूषण की आशंका भी बढ़ गई है।

बिहार के शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन में सुधार करना अब सरकार और नगर निकायों के लिए एक चुनौतीपूर्ण काम बन गया है। यदि जल्दी कदम नहीं उठाए गए तो प्रदूषण, स्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय नुकसान और बढ़ सकते हैं।

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