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पटना के गर्ल्स हॉस्टल में रात की रंगीन दुनिया: शराब और सीनियर गैंग का खेल

January 24, 20261 Mins Read
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पटना के बोरिंग रोड इलाके के कुछ गर्ल्स हॉस्टल में शराब और अवैध गतिविधियों का मामला प्रकाश में आया है, जो न केवल समाज के लिए चिंता का विषय है, बल्कि छात्राओं और उनके परिवारों के लिए भी गंभीर चेतावनी का संकेत है। नाम न उजागर करने की शर्त पर एक छात्रा ने बताया कि हॉस्टल में रोजाना शराब पार्टी आयोजित की जाती है, जिसमें सिर्फ छात्रा ही नहीं, बल्कि पुरुष भी शामिल होते हैं। छात्रा का कहना है कि यह सब हॉस्टल संचालकों और उनके सहयोगियों की देखरेख में होता है, जबकि पुलिस की मौजूदगी और संरक्षण से यह गतिविधि खुलकर जारी रहती है।

हॉस्टल की रातें: रंगीन दुनिया के पीछे का सच

इस छात्रा ने बताया कि ज्यादातर छात्राएँ ग्रामीण क्षेत्रों से पढ़ाई के लिए शहर आती हैं। वे अपने सपनों को लेकर उत्साहित होती हैं, लेकिन उन्हें सबसे पहले हॉस्टल की सीनियर छात्राओं का सामना करना पड़ता है। ये सीनियर्स नए छात्रों को अपने कब्जे में लेने का काम करती हैं। बड़े होटल में खाने-पीने, महंगी गाड़ियों में घूमने-फिरने और फैशनेबल जीवन का झांसा देकर वे इन्हें अपने नेटवर्क का हिस्सा बना लेती हैं। धीरे-धीरे छात्राएँ इस गिरोह का हिस्सा बन जाती हैं और हॉस्टल में होने वाली शराब पार्टी का हिस्सा बनती हैं।

सूत्रों के मुताबिक, यह पार्टी देर रात तक चलती है। कई बार छात्राएँ पार्टी के बाद हॉस्टल से बाहर भी जाती हैं, लेकिन सुबह अपने हॉस्टल लौट आती हैं। इस पूरे खेल का असर हॉस्टल के अंदर ही नहीं, बल्कि हॉस्टल के आसपास रहने वाले लोगों तक भी देखने को मिलता है। स्थानीय लोग दावा करते हैं कि सब कुछ जानते-बूझते हुए भी वे अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए चुप रहते हैं। हॉस्टल संचालक और उनके गैंग का शहर में इतना प्रभाव है कि इनके खिलाफ बोलना किसी के लिए आसान नहीं है।

छात्राओं का शोषण और परिवारों की जिम्मेदारी

छात्रा का कहना है कि कुछ छात्राओं को जबरन इस खेल में शामिल किया जाता है। विरोध करने पर उन्हें टारगेट भी बनाया जाता है। यह पूरी गतिविधि इतनी संगठित है कि हॉस्टल संचालक और उनके सहयोगी इसे खुलेआम अंजाम देते हैं।

हॉस्टल के आसपास काम करने वाले लोग भी इस पर चुप हैं। एक फास्ट फूड दुकान के मालिक ने कहा कि यह छात्राओं के परिवारों की जिम्मेदारी भी बनती है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर माता-पिता अपने बच्चों को हॉस्टल में रहने के लिए 10 हजार रुपये भेजते हैं, जिनमें 8 हजार हॉस्टल की फीस होती है, तो फिर उनके पास महंगे मोबाइल, ब्यूटी पार्लर और महंगे कपड़े खरीदने के लिए पैसा कहां से आता है? उनका कहना है कि गलत गतिविधियों पर सिर्फ चिल्लाने से काम नहीं चलेगा। बच्चों पर परिवार का ध्यान और निगरानी होना भी जरूरी है।

समाज में बढ़ती चिंता

इस मुद्दे ने न केवल छात्राओं के बीच भय और असुरक्षा की स्थिति पैदा की है, बल्कि परिवारों और समाज में भी गहरी चिंता उत्पन्न कर दी है। छात्राओं को रंगीन सपनों की दुनिया दिखाकर उनमें विश्वास जीतने वाले सीनियर और गैंग, उन्हें अपने नियंत्रण में ले लेते हैं। यह न केवल उनके शैक्षिक जीवन को प्रभावित करता है, बल्कि उनके व्यक्तिगत जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डालता है।

हॉस्टल के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि यह सब उन्हें पता है, लेकिन हॉस्टल संचालकों और उनके गैंग का प्रभाव इतना है कि वे सामने नहीं आ सकते। उनका डर है कि अगर उन्होंने विरोध किया या कुछ उजागर किया, तो उनके परिवार और जान पर खतरा हो सकता है। यह स्थिति बताती है कि छात्राओं की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए न केवल प्रशासनिक कदम जरूरी हैं, बल्कि समाज और परिवार की सक्रिय भागीदारी भी अनिवार्य है।

पुलिस और प्रशासन की भूमिका

छात्रा ने दावा किया कि पुलिस के संरक्षण में ही यह सब हो रहा है। इसका मतलब है कि न केवल हॉस्टल संचालक और उनका गैंग बेखौफ हैं, बल्कि कानूनी और प्रशासनिक तंत्र भी इस मामले में निष्क्रिय नजर आता है। यह स्थिति न केवल कानून की अवहेलना को उजागर करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि छात्राओं की सुरक्षा के लिए सख्त निगरानी और कार्रवाई की कितनी जरूरत है।

परिवारों का योगदान और सजगता

हॉस्टल के पास रहने वाले लोगों ने यह भी कहा कि परिवारों को अपने बच्चों के व्यवहार और आर्थिक गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए। यह देखा गया है कि कई छात्राओं के पास महंगे सामान और मोबाइल होते हैं, जिसका स्रोत अस्पष्ट होता है। यह परिवारों की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चों पर नजर रखें और उन्हें गलत गतिविधियों से दूर रखें। केवल चिल्लाने या डांटने से काम नहीं चलेगा।

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