बिहार के बेगूसराय में नए साल की पूर्व संध्या पर हुए एक चर्चित एनकाउंटर ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। जिला पुलिस और एसटीएफ की संयुक्त कार्रवाई में मारे गए कुख्यात नक्सली दयानंद मालाकार के मामले को लेकर बिहार विधान परिषद में तीखी बहस हुई। विपक्ष ने इसे फर्जी मुठभेड़ करार दिया, जबकि सरकार ने पुलिस की कार्रवाई को पूरी तरह जायज बताया। इस पूरे घटनाक्रम ने लोगों के बीच जिज्ञासा बढ़ा दी है कि आखिर दयानंद मालाकार कौन था और उसके एनकाउंटर पर इतना विवाद क्यों हो रहा है।

दरअसल, नए साल की पूर्व संध्या पर बेगूसराय जिले के तेघड़ा थाना क्षेत्र के नानपुर गांव में पुलिस और एसटीएफ ने संयुक्त ऑपरेशन चलाया था। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि वांछित नक्सली दयानंद मालाकार अपने घर में छिपा हुआ है। सूचना के आधार पर टीम ने इलाके की घेराबंदी कर दबिश दी। पुलिस का दावा है कि गिरफ्तारी के प्रयास के दौरान मालाकार ने टीम पर फायरिंग शुरू कर दी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में वह मारा गया।
लेकिन इस कार्रवाई पर सवाल तब खड़े हो गए जब विधान परिषद में आरजेडी एमएलसी शशि सिंह ने इसे मुठभेड़ नहीं बल्कि सुनियोजित हत्या बताया। सदन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी द्वारा कराई गई पड़ताल में यह सामने आया है कि मालाकार को पकड़कर मारा गया। उन्होंने सरकार से स्पष्ट जवाब देने की मांग की और कहा कि यदि कोई अपराधी है तो उसे कानून और अदालत के जरिए सजा मिलनी चाहिए, न कि एनकाउंटर के जरिए।
शशि सिंह के इस आरोप के बाद सदन में माहौल गरमा गया। विपक्ष के तेवर तीखे थे और सरकार से पारदर्शिता की मांग की गई। इस पर गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि दयानंद मालाकार की मौत पुलिस और एसटीएफ के साथ हुई वास्तविक मुठभेड़ में हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मालाकार के खिलाफ करीब 21 आपराधिक मामले दर्ज थे और वह लंबे समय से फरार चल रहा था। मंत्री ने कहा कि अपराधियों के खिलाफ पुलिस लगातार कार्रवाई करती है और उसी क्रम में यह ऑपरेशन हुआ।
गृह मंत्री ने यह भी कहा कि पुलिस को मालाकार की मौजूदगी की पुख्ता सूचना मिली थी, जिसके बाद संयुक्त टीम ने कार्रवाई की। उन्होंने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार का रुख साफ है और पुलिस ने कानून के दायरे में रहकर काम किया है। हालांकि विपक्ष अपने आरोपों पर कायम रहा और निष्पक्ष जांच की मांग दोहराता रहा।
अब सवाल उठता है कि दयानंद मालाकार आखिर था कौन, जिसकी मौत ने राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक दयानंद मालाकार, जिसे दमन के नाम से भी जाना जाता था, उत्तर बिहार का एक कुख्यात नक्सली और एरिया कमांडर था। उसका प्रभाव बेगूसराय, मुजफ्फरपुर समेत कई जिलों में बताया जाता था। उस पर हत्या, लूट और विस्फोटक अधिनियम के तहत 21 से अधिक मामले दर्ज थे।
पुलिस के अनुसार मालाकार लंबे समय से फरार था और सुरक्षा एजेंसियां उसकी तलाश में जुटी थीं। कई बार वह गिरफ्तार हुआ, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद फिर आपराधिक गतिविधियों में सक्रिय हो जाता था। उसकी गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपये का इनाम भी घोषित था। एसटीएफ और जिला पुलिस दोनों ही उसे पकड़ने के लिए लगातार अभियान चला रहे थे।
घटना वाले दिन पुलिस को सूचना मिली कि मालाकार अपने घर में मौजूद है। इसके बाद शाम के समय संयुक्त टीम ने इलाके में दबिश दी। पुलिस का कहना है कि टीम को देखते ही मालाकार ने फायरिंग शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई में दोनों ओर से करीब बीस-बीस राउंड गोलियां चलीं। इसी मुठभेड़ में वह अपने घर में ही ढेर हो गया।
हालांकि विपक्ष का आरोप है कि पूरी कहानी संदिग्ध है और इसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि कोई व्यक्ति वांछित था तो उसे गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाना चाहिए था। इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है।
इधर पुलिस और सरकार अपने रुख पर कायम हैं। अधिकारियों का कहना है कि ऑपरेशन पूरी तरह पेशेवर तरीके से किया गया और टीम ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की। सूत्रों के मुताबिक पुलिस ने इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज और रिपोर्ट तैयार कर ली है।
कुल मिलाकर, दयानंद मालाकार का एनकाउंटर अब सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय बन चुका है। एक तरफ सरकार इसे अपराध के खिलाफ बड़ी सफलता बता रही है, वहीं विपक्ष इसे फर्जी मुठभेड़ बताकर सवाल उठा रहा है। सच क्या है, यह आने वाली जांच और आधिकारिक रिपोर्ट से ही पूरी तरह स्पष्ट हो पाएगा। फिलहाल इस घटना ने बिहार की सियासत और कानून व्यवस्था दोनों पर नई बहस छेड़ दी है।







