मुजफ्फरपुर के श्री कृष्णा मेडिकल कॉलेज अस्पताल (एसकेएमसीएच) में इलाज के दौरान 20 वर्षीय युवक की मौत के बाद बुधवार शाम अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। मृतक के परिजनों ने इलाज में गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जमकर हंगामा किया। बेटे को खो चुकी मां का दर्द और गुस्सा देखकर मौके पर मौजूद लोग भी भावुक हो गए। इस घटना ने एक बार फिर सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

मृतक की पहचान शिवहर जिले के सुगिया थाना क्षेत्र निवासी संतोष कुमार के रूप में हुई है। परिजनों के अनुसार, संतोष को कई दिनों से तेज बुखार था, जिसके बाद रविवार 1 फरवरी को उसे एसकेएमसीएच में भर्ती कराया गया था। शुरुआत में डॉक्टरों ने जांच कर दवाइयां दीं, लेकिन इसके बावजूद उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। मां का आरोप है कि लगातार शिकायत करने के बाद भी डॉक्टरों और अस्पताल कर्मियों ने गंभीरता नहीं दिखाई।
परिजनों का कहना है कि मंगलवार से ही संतोष की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी और वह बार-बार दर्द से कराह रहा था। इसके बावजूद समय पर डॉक्टर नहीं पहुंचे और न ही कोई ठोस इलाज शुरू किया गया। मां का आरोप है कि जब वह बार-बार नर्स और डॉक्टरों से गुहार लगाती रहीं, तो उन्हें टालने वाला रवैया अपनाया गया।
बुधवार को हालत और ज्यादा नाजुक हो गई। परिजनों ने तत्काल डॉक्टर को बुलाया, जिसके बाद कुछ उपचार किया गया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। कुछ ही समय बाद संतोष कुमार ने दम तोड़ दिया। बेटे की मौत की खबर सुनते ही मां बदहवास हो गईं और अस्पताल परिसर में चीख-पुकार मच गई। गुस्साए परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाते हुए अस्पताल प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
घटना की सूचना मिलते ही मेडिकल कॉलेज ओपी की पुलिस मौके पर पहुंची और परिजनों को शांत कराने का प्रयास किया। पुलिस अधिकारियों ने परिजनों से बातचीत कर मामले की जानकारी ली और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया। पुलिस का कहना है कि शिकायत के आधार पर पूरे मामले की जांच की जाएगी और यदि इलाज में लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
इस घटना के बाद अस्पताल परिसर में कुछ देर के लिए तनाव का माहौल बन गया। मरीजों और उनके परिजनों में भी डर और नाराजगी देखने को मिली। स्थानीय लोगों का कहना है कि एसकेएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में इस तरह की घटनाएं चिंता का विषय हैं। अक्सर मरीजों के परिजन इलाज में देरी और डॉक्टरों की अनुपलब्धता की शिकायत करते रहे हैं, लेकिन सुधार के ठोस कदम अब तक नजर नहीं आए हैं।
संतोष की मौत ने न सिर्फ एक परिवार को उजाड़ दिया, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत भी उजागर कर दी है। सवाल यह है कि क्या समय पर और सही इलाज मिलने से उसकी जान बचाई जा सकती थी? अब सबकी नजरें जांच पर टिकी हैं, जिससे यह तय हो सके कि इस दर्दनाक मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है।







