Shopping cart

Breaking News :
  • Home
  • बिहार
  • पटना
  • पटना HC ने 70 हजार करोड़ रुपये के उपयोग पर नीतीश सरकार को सूचना देने का आदेश दिया
पटना

पटना HC ने 70 हजार करोड़ रुपये के उपयोग पर नीतीश सरकार को सूचना देने का आदेश दिया

January 21, 20261 Mins Read
16

पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार से राज्य के विभिन्न विभागों द्वारा करीब 70 हजार करोड़ रुपये के उपयोग के मामले में पूरी जानकारी प्रस्तुत करने को कहा है। यह आदेश किशोर कुमार की ओर से दायर की गई याचिका पर दिया गया। याचिका में दावा किया गया कि सरकारी विभागों ने कई मामलों में जरूरी उपयोगिता प्रमाणपत्र (UC) जमा नहीं किए हैं, जिससे फंड के सही इस्तेमाल पर सवाल उठते हैं।

इस मामले की सुनवाई मंगलवार को पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने की। खंडपीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू और न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह ने याचिका पर विस्तृत चर्चा की। कोर्ट को बताया गया कि राज्य सरकार के विभागों ने 49,649 मामलों में उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा नहीं किए हैं, और इन मामलों में कुल लगभग 70 हजार करोड़ रुपये की राशि शामिल है।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि यह अनियमितता वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2022-23 तक की है। इसके बावजूद विभागों ने अब तक इस संबंध में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि इस मामले की गहन जांच हो और इसका जिम्मेदार पता लगाया जाए।

सुनवाई के दौरान अदालत ने सीएजी (कैग) की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें इस विषय पर स्पष्ट टिप्पणी की गई थी। सीएजी ने अपने रिपोर्ट में कहा था कि उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा न करने की यह स्थिति गंभीर है और इसे लेकर सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए।

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी विभागों द्वारा 49,649 मामलों में UC न जमा करने के कारणों और संबंधित राशि के विवरण को कोर्ट में पेश किया जाए। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि सरकार को सिर्फ संख्याओं का विवरण नहीं देना है, बल्कि यह भी बताना होगा कि किस विभाग ने कितनी राशि का उपयोग किया और किन कारणों से प्रमाणपत्र जमा नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता ने कहा कि जब तक उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा नहीं होते, तब तक यह कहा जा सकता है कि सरकारी फंड का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हुआ। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि मामले की गहन जांच हो और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

कोर्ट ने राज्य सरकार को इस पूरे मामले की पूर्ण रिपोर्ट दो महीने के भीतर पेश करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई तय की गई है और अदालत ने स्पष्ट किया कि यह केवल जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह फंड के उपयोग और सरकारी विभागों की जवाबदेही की जांच का एक महत्वपूर्ण कदम है।

विशेषज्ञों के अनुसार, उपयोगिता प्रमाणपत्र सरकारी फंड की पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक अहम दस्तावेज़ है। इसके बिना यह अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है कि राज्य सरकार द्वारा आवंटित राशि का सही उपयोग हुआ है या नहीं।

राज्य में पिछले कुछ वर्षों में यह मामला लगातार बढ़ता गया है। वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2022-23 तक लगभग 70 हजार करोड़ रुपये की राशि विभिन्न विभागों को आवंटित की गई थी। इनमें से अधिकांश राशि के लिए उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा नहीं किए गए। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सरकारी योजनाओं का पैसा सही ढंग से उपयोग हुआ या कहीं फंड के दुरुपयोग की आशंका है।

सीएजी ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में कहा है कि इस मामले की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता है। उनका कहना है कि यदि यह मामला समय रहते नहीं सुलझाया गया, तो राज्य में सरकारी फंड की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।

याचिकाकर्ता किशोर कुमार ने अदालत को यह भी बताया कि कई विभागों ने सिर्फ समय पर प्रमाणपत्र नहीं दिए, बल्कि कुछ विभागों ने पूरी तरह से अनदेखी की। उनका मानना है कि बिना उपयोगिता प्रमाणपत्र के, यह तय करना मुश्किल है कि आवंटित राशि का सही तरीके से उपयोग हुआ या नहीं।

पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला केवल अर्थशास्त्र या प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल नहीं है, बल्कि यह जनता के करों और सरकारी फंड की सुरक्षा का मामला है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी विभागों से UC की स्थिति की जांच कर रिपोर्ट तैयार की जाए, और इसमें यह भी शामिल हो कि कौन से विभागों ने समय पर UC जमा नहीं किए और कारण क्या रहे।

इस आदेश के बाद राज्य सरकार के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह सबूत और दस्तावेज़ तैयार करके अदालत में पेश करे। साथ ही, अगर किसी विभाग ने नियमों का उल्लंघन किया है, तो उसकी जवाबदेही तय की जाएगी।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अदालत का यह आदेश राज्य में सरकारी फंड की पारदर्शिता बढ़ाने और जवाबदेही तय करने के लिए एक बड़ा कदम है। इससे भविष्य में सरकारी विभागों द्वारा फंड का दुरुपयोग कम हो सकता है और जनता के करों का सही उपयोग सुनिश्चित होगा।

अगली सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि राज्य सरकार ने आदेश के अनुसार सभी जानकारी पूरी और सही तरीके से प्रस्तुत की या नहीं। साथ ही, अगर आवश्यक हुआ तो अदालत स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने का भी निर्णय ले सकती है।

इस मामले को लेकर राज्य के नागरिक भी उत्सुक हैं। उनका कहना है कि अगर इतने बड़े पैमाने पर फंड का उपयोग बिना प्रमाणपत्र के हुआ है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और वित्तीय लापरवाही को दर्शाता है।

पटना हाईकोर्ट की इस कार्रवाई से यह संदेश जाता है कि राज्य सरकार और उसके विभाग जनता के पैसों के प्रति जवाबदेह हैं, और किसी भी अनियमितता को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।

Related Posts