पटना/वैशाली। बिहार समेत कई राज्यों में ज्वेलरी दुकानों को निशाना बनाने वाला वैशाली का कुख्यात अपराधी प्रिंस कुमार लूटे गए सोने को नेपाल और पश्चिम बंगाल में खपाता था। पुलिस जांच में सामने आया कि वह सोना बेचने के कुछ ही घंटों के भीतर पिघला दिया जाता था और उससे नए आभूषण तैयार कर लिए जाते थे, ताकि उसकी पहचान मिट जाए। नेपाल को वह अपने लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना मानता था। वारदात के बाद वह अक्सर सीमा पार कर फरार हो जाता था।

पटना पुलिस ने करीब दो वर्ष पहले उसके नेटवर्क का बड़ा खुलासा किया था, जब उसे पंजाब से गिरफ्तार कर पटना लाया गया था। उस समय पूछताछ में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे। पुलिस के अनुसार, प्रिंस बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में वारदातों को अंजाम देने के बाद नेपाल भाग जाता था। वहां उसके कई स्थानीय संपर्क थे, जो उसे छिपने और सीमा पार करने में मदद करते थे।
2023 की बड़ी लूट में आया नाम
प्रिंस का नाम 2023 में दानापुर और आशियाना-दीघा रोड स्थित सोने की दुकानों में हुई लूट की घटनाओं में सामने आया था। इन वारदातों के बाद से ही वह पुलिस के रडार पर था। जांच एजेंसियों को उसके खिलाफ पुख्ता सुराग मिले थे, लेकिन गिरफ्तारी आसान नहीं थी।
इसी दौरान पूर्णिया के तनिष्क शोरूम में करीब दो करोड़ रुपये मूल्य के सोने की लूट ने पूरे राज्य को हिला दिया। पुलिस का कहना है कि इस वारदात में भी प्रिंस की भूमिका सामने आई थी। वह बेहद सुनियोजित तरीके से घटनाओं को अंजाम देता था। पहले रेकी कराई जाती, फिर हथियारबंद बदमाश दुकान में घुसकर कुछ ही मिनटों में लूट की वारदात को अंजाम देकर फरार हो जाते।
जेल में बंद सुबोध के इशारे पर चलता था गिरोह
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि प्रिंस पश्चिम बंगाल की जेल में बंद कुख्यात अपराधी सुबोध के इशारे पर काम करता था। गिरोह का संचालन जेल के अंदर से होता था और बाहर प्रिंस उसकी योजनाओं को अंजाम देता था। पटना की घटनाओं में सोनू पटेल नामक अपराधी ने भी कई बार उसकी मदद की थी।
जांच अधिकारियों के मुताबिक, प्रिंस के गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद संगठित थी। वारदात के तुरंत बाद लूट का सोना सीमावर्ती इलाकों के जरिए नेपाल या पश्चिम बंगाल पहुंचा दिया जाता था। वहां उसे स्थानीय सुनारों के माध्यम से पिघलाकर नए गहनों में बदल दिया जाता था। इस प्रक्रिया के बाद यह पता लगाना लगभग असंभव हो जाता था कि सोना लूट का है।
नेपाल में मिलता था सुरक्षित ठिकाना
नेपाल की खुली सीमा प्रिंस के लिए ढाल का काम करती थी। पुलिस को कई बार सूचना मिली कि वह नेपाल में छिपा हुआ है, लेकिन तकनीकी और कानूनी अड़चनों के कारण उसकी गिरफ्तारी में मुश्किलें आती रहीं। सीमा पार करने में बिहार और नेपाल के उसके सहयोगी सक्रिय रहते थे।
बिहार पुलिस ने कई बार सीमा पर डेरा डालकर उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच निकलता था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि उसे सीमा क्षेत्र की भौगोलिक जानकारी थी और वह स्थानीय नेटवर्क के सहारे फरार हो जाता था। यही वजह थी कि वह नेपाल को सबसे सुरक्षित मानता था।
मुठभेड़ में अंत, कई राज दफन
हालिया मुठभेड़ में प्रिंस के मारे जाने के बाद उसके आपराधिक नेटवर्क से जुड़े कई राज हमेशा के लिए दफन हो गए। हालांकि पुलिस का कहना है कि उसके खिलाफ पहले से जुटाए गए साक्ष्यों और पूछताछ के आधार पर गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान की जा चुकी है और कार्रवाई जारी है।
प्रिंस के खात्मे से पटना, वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और आसपास के जिलों के स्वर्ण व्यवसायियों ने राहत की सांस ली है। पिछले कुछ वर्षों से ज्वेलरी दुकानदार उसके नाम से दहशत में रहते थे। कई कारोबारियों ने सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए थे और पुलिस से लगातार सुरक्षा की मांग कर रहे थे।
कारोबारियों में राहत
स्वर्ण व्यवसायियों का कहना है कि प्रिंस और उसके गिरोह की सक्रियता के कारण व्यापार प्रभावित हो रहा था। लगातार लूट की घटनाओं से ग्राहकों का भरोसा भी डगमगाने लगा था। अब उसके मारे जाने के बाद व्यापारियों को उम्मीद है कि हालात सामान्य होंगे।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, सीमा पार अपराध और संगठित गिरोहों के खिलाफ अभियान जारी रहेगा। उनका कहना है कि प्रिंस का नेटवर्क भले ही बड़ा था, लेकिन कानून से बच पाना संभव नहीं है।
कुल मिलाकर, लूट के सोने को नेपाल और पश्चिम बंगाल में खपाने वाले इस कुख्यात अपराधी की कहानी संगठित अपराध के उस चेहरे को उजागर करती है, जहां सीमाओं और तकनीकी चुनौतियों का फायदा उठाकर अपराधी लंबे समय तक कानून की पकड़ से दूर रहते हैं। हालांकि अंततः पुलिस कार्रवाई ने उसके आतंक पर विराम लगा दिया, जिससे राज्य के स्वर्ण कारोबारियों को बड़ी राहत मिली है।







