बिहार में ‘भारत रत्न’ का नाम आते ही राजनीति गर्म हो जाती है। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान की घोषणा अक्सर केवल सम्मान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि राज्य की राजनीतिक दिशा भी बदल देती है। पिछली बार 2024 में जब जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत यह सम्मान मिला, तो बिहार की सियासत ने बड़ी करवट ली।

1954 से 2024 तक 27 बार देश के राष्ट्रपति ने ‘भारत रत्न’ प्रदान किया, ज्यादातर बार एक ही नाम को, कभी-कभी दो या अधिक नामों को। इस साल भी चर्चा तेज है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुराने मित्र और पार्टी के राष्ट्रीय चेहरा रहे केसी त्यागी ने उनके लिए इस सम्मान की मांग दिल्ली में की, जिसे लेकर बिहार में हलचल मची। इस पर तेजप्रताप यादव ने अपने पिता लालू प्रसाद यादव के लिए भी मांग शुरू कर दी।
पिछली बार ‘भारत रत्न’ ने बिहार की राजनीति बदल दी
1962 में बिहार के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को, 1999 में लोकनायक जय प्रकाश नारायण को और 1992 में जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा को सम्मान मिल चुका है। 2024 में जब जननायक कर्पूरी ठाकुर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ दिया गया, तो बिहार की सियासत ने करवट ली। इसके बाद नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की राज्य में वापसी तय की।
नीतीश कुमार के नाम की चर्चा और पार्टी का रुख
जनवरी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए ‘भारत रत्न’ की चर्चा हुई, लेकिन औपचारिक अनुशंसा का समय पहले ही खत्म हो चुका था। कई बार यह सम्मान सालों बाद ही दिया गया है, इसलिए राजनीतिक विश्लेषक इसे एक स्टंट भी मान रहे हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद ने इस मांग पर सवाल उठाए, जबकि केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने इसे उचित बताया। चिराग पासवान ने भी नीतीश कुमार को इस सम्मान के योग्य बताया।
लालू यादव को मिलना संभव?
लालू प्रसाद यादव के लिए यह मांग उनके बेटे तेजप्रताप यादव ने उठाई, लेकिन चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने और राजनीतिक सीमाओं के कारण इसे तुरंत लागू होना मुश्किल दिखता है। कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों ने भी कहा कि अभी उचित समय नहीं है।
इस बार भी जैसे ही ‘भारत रत्न’ का एलान होगा, बिहार की राजनीति में हलचल बढ़ना तय है। सवाल यह है कि नीतीश या लालू में से कोई नाम सूची में शामिल होगा या नहीं।







