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मंत्री अशोक चौधरी अब प्रोफेसर भी

February 17, 20261 Mins Read
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बिहार की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रहे ग्रामीण कार्य विकास मंत्री अशोक चौधरी को आखिरकार लंबे इंतजार के बाद विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक के पद पर नियुक्ति मिल गई है। अब वे प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं देंगे। उनकी नियुक्ति राजधानी पटना स्थित प्रतिष्ठित अनुग्रह नारायण कॉलेज (ए. एन. कॉलेज) में राजनीति विज्ञान विभाग में की गई है, जो पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय से संबद्ध है।

सोमवार को आयोजित एक औपचारिक कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलपति उपेंद्र प्रसाद सिंह ने उन्हें आधिकारिक नियुक्ति पत्र सौंपा। इस अवसर पर विश्वविद्यालय प्रशासन और अन्य गणमान्य लोग उपस्थित रहे। नियुक्ति पत्र प्राप्त करने के बाद अशोक चौधरी ने इसे अपने जीवन का भावनात्मक और गर्वपूर्ण क्षण बताया।

पिता का सपना हुआ साकार

नियुक्ति के बाद मंत्री अशोक चौधरी ने कहा कि यह पल उनके लिए सिर्फ एक पेशेवर उपलब्धि नहीं, बल्कि व्यक्तिगत भावनाओं से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि उनके स्वर्गीय पिता महावीर चौधरी हमेशा चाहते थे कि उनका बेटा विश्वविद्यालय में शिक्षक बने और विद्यार्थियों को शिक्षा के माध्यम से मार्गदर्शन दे। आज सहायक प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति मिलना उनके पिता के उसी सपने का साकार होना है।

उन्होंने कहा कि राजनीति और शिक्षा दोनों ही समाज निर्माण के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। एक मंत्री के रूप में जहां वे विकास कार्यों के जरिए जनता की सेवा कर रहे हैं, वहीं शिक्षक के रूप में वे नई पीढ़ी को जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनाने में योगदान देना चाहते हैं।

चयन प्रक्रिया और औपचारिकताएं

अशोक चौधरी का चयन बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा आयोजित प्रक्रिया के तहत हुआ है। आयोग ने जून 2025 में सहायक प्राध्यापक पद के लिए चयन सूची जारी की थी। उसी के आधार पर उनकी नियुक्ति की औपचारिकताएं पूरी की गईं।

विश्वविद्यालय के कुलसचिव अबू बकर रिजवी ने बताया कि नियुक्ति की सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप पूरी की गई हैं। विश्वविद्यालय मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम के दौरान शिक्षा के महत्व और राज्य के समग्र विकास में उच्च शिक्षा की भूमिका पर भी चर्चा की गई।

इस अवसर पर अशोक चौधरी ने अपने संदेश में विश्वविद्यालय प्रशासन और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष रूप से मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस. पी. शाही का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ने की ताकत दी।

बिना वेतन देंगे सेवाएं

सबसे दिलचस्प बात यह है कि अशोक चौधरी ने स्पष्ट किया है कि वे सहायक प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएं बिना वेतन के देंगे। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि शैक्षणिक योगदान है।

जानकारी के अनुसार, बिहार में सहायक प्राध्यापक का वेतनमान करीब एक लाख रुपये प्रतिमाह के आसपास होता है। बावजूद इसके, मंत्री ने यह निर्णय लिया है कि वे इस पद पर रहते हुए कोई वेतन स्वीकार नहीं करेंगे। उनके इस फैसले को कई लोग सकारात्मक पहल के रूप में देख रहे हैं, वहीं राजनीतिक हलकों में इसे लेकर चर्चा भी तेज हो गई है।

नियुक्ति में आई थी बाधा

अशोक चौधरी की नियुक्ति प्रक्रिया पहले कुछ कारणों से अटक गई थी। दरअसल उनके नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। शैक्षणिक प्रमाणपत्रों में उनका नाम ‘अशोक कुमार’ दर्ज था, जबकि चुनावी हलफनामे में उनका नाम ‘अशोक चौधरी’ था। इस अंतर को लेकर आपत्ति जताई गई और मामला अदालत तक पहुंच गया।

इस मुद्दे को कांग्रेस नेता असित नाथ तिवारी ने प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने नाम में अंतर को स्पष्ट करने की मांग की थी। बाद में यह मामला न्यायालय में गया, जहां से फैसला अशोक चौधरी के पक्ष में आया। अदालत के निर्णय के बाद ही नियुक्ति की राह साफ हुई।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी स्पष्ट किया कि सभी दस्तावेजों की जांच के बाद ही नियुक्ति पत्र जारी किया गया है।

राजनीति और शिक्षा का संगम

अशोक चौधरी की नियुक्ति को कई विश्लेषक राजनीति और शिक्षा के बीच एक सेतु के रूप में देख रहे हैं। आमतौर पर सक्रिय राजनीति में रहने वाले नेताओं का शिक्षण कार्य से सीधा जुड़ाव कम देखने को मिलता है। ऐसे में एक मंत्री का विश्वविद्यालय में पढ़ाना नई पहल के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई जनप्रतिनिधि शिक्षण कार्य से जुड़ता है तो उसे समाज और युवाओं की सोच को करीब से समझने का अवसर मिलता है। इससे नीतियों के निर्माण में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि विपक्ष के कुछ नेताओं ने इसे लेकर सवाल भी उठाए हैं कि क्या एक मंत्री अपने व्यस्त राजनीतिक कार्यक्रम के बीच नियमित रूप से कक्षाएं ले पाएंगे। इस पर अशोक चौधरी का कहना है कि वे अपने दायित्वों का संतुलन बनाएंगे और विद्यार्थियों के साथ न्याय करेंगे।

नई जिम्मेदारी, नया संकल्प

सोशल मीडिया पर अपनी नियुक्ति की जानकारी साझा करते हुए अशोक चौधरी ने लिखा कि यह उनके जीवन का गौरवपूर्ण क्षण है। उन्होंने इसे नई जिम्मेदारी और नए संकल्प की शुरुआत बताया।

उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है और वे इसी दिशा में कार्य करेंगे। उनका मानना है कि युवा पीढ़ी को सही दिशा और प्रेरणा देना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

अंततः, मंत्री से प्रोफेसर बने अशोक चौधरी की यह नई भूमिका बिहार की राजनीति और शिक्षा जगत दोनों के लिए चर्चा का विषय बन गई है। अब देखना होगा कि वे किस प्रकार दोनों जिम्मेदारियों का संतुलन बनाते हुए अपनी नई पारी की शुरुआत करते हैं।

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