राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पर उनके साले और राबड़ी देवी के भाई सुभाष यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया है कि लालू-राबड़ी शासनकाल के दौरान बिहार में होने वाले अपहरण के मामलों में फिरौती की रकम मुख्यमंत्री आवास पर तय की जाती थी। सुभाष यादव के इस बयान ने राज्य की सियासत में नई हलचल पैदा कर दी है।

सुभाष यादव ने कहा कि उस दौर में अपहरण उद्योग चरम पर था और बड़े मामलों में यह तय होता था कि किससे कितनी रकम वसूली जानी है। उनका आरोप है कि यह पूरा खेल सत्ता के शीर्ष स्तर से संचालित होता था। उन्होंने कहा कि अपहरण से जुड़े बड़े फैसलों में लालू प्रसाद यादव, पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन और प्रेमचंद गुप्ता की भूमिका होती थी।
‘सीएम हाउस से तय होती थी डील’
सुभाष यादव ने दावा किया कि अपहरण के बाद फिरौती की रकम तय करने की बातचीत मुख्यमंत्री आवास पर होती थी। उन्होंने आरोप लगाया कि किस परिवार से कितनी राशि ली जानी है, यह वहीं बैठकर तय किया जाता था। हालांकि उन्होंने अपने दावों के समर्थन में कोई दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन उनके बयान ने पुराने राजनीतिक घटनाक्रमों को फिर चर्चा में ला दिया है।
उनका कहना है कि उस समय बिहार में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब थी और अपहरण की घटनाएं आम थीं। बड़े कारोबारी, डॉक्टर और उद्योगपति अक्सर निशाने पर रहते थे। सुभाष यादव के मुताबिक, इन मामलों में राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगना कोई नई बात नहीं थी, लेकिन उन्होंने पहली बार खुलकर यह दावा किया है कि फैसले सत्ता के केंद्र से लिए जाते थे।
पुराने अपहरण कांड का जिक्र
सुभाष यादव ने अपने बयान में एक चर्चित अपहरण मामले का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि एक बड़े कारोबारी समूह से जुड़े व्यक्ति का अपहरण अररिया से किया गया था। आरोप है कि उसे दिल्ली में छह करोड़ रुपये की रकम लेने के बाद छोड़ा गया। उन्होंने यह भी कहा कि उस मामले में जाकिर हुसैन का नाम उछाला गया था, जबकि असल में अपहरण किसी अन्य व्यक्ति ने किया था।
सुभाष यादव के अनुसार, अपहृत व्यक्ति को सहरसा के काला दियारा क्षेत्र में नाव पर रखा गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ नेताओं द्वारा आरोपी को बचाने की कोशिश की गई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है और संबंधित पक्षों की ओर से अभी तक औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
घोटालों पर भी बोला हमला
सुभाष यादव ने पशुपालन घोटाला, अलकतरा घोटाला सहित अन्य मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि उन पर भी कई आरोप लगाए गए, लेकिन उनके खिलाफ कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। उन्होंने कहा, “जिसने चोरी की है, वही सजा भुगत रहा है। हमने कोई चोरी नहीं की, सिर्फ बदनाम किया गया।” उनका इशारा उन नेताओं की ओर था जिन्हें विभिन्न मामलों में सजा मिली है।
उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ राजनीतिक साजिश के तहत माहौल बनाया गया, जबकि असली फैसले कहीं और लिए जाते थे। उनका दावा है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया, जबकि असली खेल सत्ता के गलियारों में चलता रहा।
सियासी हलचल तेज
सुभाष यादव के आरोप ऐसे समय आए हैं जब बिहार की राजनीति में गठबंधनों और नेतृत्व को लेकर लगातार बयानबाजी हो रही है। उनके बयान को राजनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान पुराने मतभेदों या व्यक्तिगत विवादों का नतीजा हो सकता है, जबकि अन्य इसे उस दौर की राजनीति पर गंभीर टिप्पणी मान रहे हैं।
राजद की ओर से फिलहाल इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। पार्टी के नेताओं का कहना है कि यह बयान व्यक्तिगत राय हो सकती है और इसका पार्टी की आधिकारिक लाइन से कोई संबंध नहीं है। वहीं विपक्षी दलों ने इन आरोपों को गंभीर बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
कानूनी और राजनीतिक सवाल
यदि सुभाष यादव के आरोपों में सच्चाई है, तो यह बेहद गंभीर मामला बन सकता है। हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि वे अपने दावों को साबित करने के लिए कोई कानूनी कदम उठाएंगे या नहीं। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि इतने वर्षों बाद ऐसे आरोप सामने लाने के पीछे क्या कारण हैं।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि इतने पुराने मामलों में जांच करना आसान नहीं होता, खासकर तब जब प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध न हों। फिर भी, यदि कोई व्यक्ति औपचारिक शिकायत दर्ज कराता है और ठोस सबूत पेश करता है, तो जांच एजेंसियां कार्रवाई कर सकती हैं।
आगे क्या?
सुभाष यादव के बयान ने बिहार की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। क्या यह सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति है, या फिर किसी बड़े खुलासे की शुरुआत? आने वाले दिनों में यह साफ हो सकता है। फिलहाल सभी की नजर इस बात पर है कि लालू प्रसाद यादव या उनकी पार्टी की ओर से इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया आती है।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि इन आरोपों को लेकर कोई औपचारिक शिकायत दर्ज होती है, तो मामला कानूनी रूप ले सकता है। तब यह सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया का विषय बन जाएगा।
फिलहाल इतना तय है कि सुभाष यादव के इस बयान ने पुराने दौर की राजनीति और कानून-व्यवस्था को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अब देखना होगा कि यह मामला आगे किस दिशा में जाता है और क्या इन आरोपों पर कोई ठोस कार्रवाई होती है या नहीं।







