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‘पुलिस मित्र’ के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा, मोतिहारी में 42 युवाओं से लाखों की ठगी

February 4, 20261 Mins Read
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बिहार के मोतिहारी जिले से बेरोजगार युवाओं को ठगने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां ‘पुलिस मित्र’ की नौकरी दिलाने का झांसा देकर 42 युवकों से लाखों रुपये वसूले गए। ठगों ने खुद को पुलिस विभाग से जुड़ा और प्रभावशाली बताकर न केवल युवाओं का भरोसा जीता, बल्कि फर्जी दस्तावेज, आई-कार्ड और थानों में एंट्री दिलाकर पूरे खेल को असली साबित करने की कोशिश की। हैरानी की बात यह है कि यह ठगी लंबे समय तक पुलिस की नजरों से दूर रही और कई युवक महीनों तक वेतन का इंतजार करते रहे।

जानकारी के अनुसार, इस पूरे मामले का मास्टरमाइंड खुद को पुलिस विभाग से जुड़ा बताता था। उसने मोतिहारी और आसपास के इलाकों के बेरोजगार युवाओं को यह कहकर अपने जाल में फंसाया कि बिहार पुलिस में ‘पुलिस मित्र’ के पद पर बहाली होने जा रही है। ठग ने दावा किया कि चयनित युवाओं को थानों से जोड़ा जाएगा और उन्हें हर महीने 16 हजार रुपये मानदेय मिलेगा। बेरोजगारी से परेशान युवाओं के लिए यह ऑफर किसी सपने से कम नहीं था।

भरोसा जीतने के लिए ठग ने बेहद चालाकी से पूरी योजना बनाई। उसने कथित तौर पर डीजीपी के नाम से लिखा गया एक पत्र दिखाया, जिस पर रिसीविंग होने का दावा किया गया था। इतना ही नहीं, युवाओं को फर्जी आई-कार्ड भी दिए गए, जिन पर ‘पुलिस मित्र’ लिखा हुआ था। कई युवकों को अलग-अलग थानों में ले जाकर बैठाया गया, ताकि उन्हें लगे कि वे वास्तव में पुलिस विभाग का हिस्सा बन चुके हैं।

इस ठगी का दायरा सिर्फ एक-दो थाना क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा। अरेराज, घोड़ासहन, पलनवा और गोविंदगंज जैसे इलाकों के युवक भी इस जाल में फंसे। आरोप है कि अरेराज की महिला थानाध्यक्ष की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है। पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने एक रिटायर्ड चौकीदार के बेटे को इस बहाली के लिए तैयार किया। बताया गया कि अरेराज थाना से सेवानिवृत्त तीन चौकीदारों के बेटों से 20-20 हजार रुपये लिए गए, जबकि कुल 60 हजार रुपये प्रति युवक की मांग की गई थी। बाकी रकम वेतन शुरू होने के बाद देने की बात कही गई थी।

ठगों ने युवाओं से पैसे लेने के बाद उन्हें लगातार वेतन शुरू होने का झांसा दिया। कभी कहा जाता कि बैंक पासबुक जमा करनी है, तो कभी यह कहकर टाल दिया जाता कि प्रक्रिया चल रही है। कई बार युवाओं को मुजफ्फरपुर के एक होटल में बुलाया गया, जहां उन्हें भरोसा दिलाया गया कि जल्द ही उनके खाते में पैसा आने लगेगा। इस दौरान युवक खुद को पुलिस मित्र मानकर थानों के चक्कर काटते रहे, लेकिन उन्हें कभी कोई आधिकारिक नियुक्ति पत्र नहीं मिला।

समय बीतने के साथ जब महीनों तक न वेतन आया और न ही कोई ठोस कागजात मिले, तो युवकों को शक होने लगा। जब उन्होंने ठग से संपर्क करने की कोशिश की, तो टालमटोल बढ़ने लगी। कुछ मामलों में फोन उठाना भी बंद कर दिया गया। इसके बाद पीड़ित युवकों ने आपस में बात की और सच्चाई सामने आने लगी। तब जाकर पूरे फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ।

मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़ितों ने पुलिस से शिकायत की। मोतिहारी के कोटवा थाने में मुख्य आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। एसपी स्वर्ण प्रभात ने बताया कि इस पूरे मामले की गहन जांच के लिए एएसपी के नेतृत्व में एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन किया गया है। टीम यह पता लगाने में जुटी है कि इस ठगी में और कौन-कौन लोग शामिल थे और क्या किसी स्तर पर पुलिसकर्मियों की मिलीभगत रही।

पुलिस अब यह भी जांच कर रही है कि फर्जी आई-कार्ड और डीजीपी के नाम पर दिखाए गए पत्र कहां से तैयार किए गए। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि युवकों को थानों में एंट्री कैसे मिली और किसकी अनुमति से उन्हें वहां बैठाया गया। यदि किसी भी पुलिसकर्मी की संलिप्तता पाई जाती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही जा रही है।

यह मामला एक बार फिर बेरोजगार युवाओं की मजबूरी और ठगों की शातिर सोच को उजागर करता है। नौकरी की तलाश में भटक रहे युवा अक्सर ऐसे झांसे में आ जाते हैं, जहां उन्हें सरकारी नौकरी या विभाग से जुड़ने का सपना दिखाया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी बहाली के लिए आधिकारिक विज्ञापन और प्रक्रिया होती है, ऐसे में किसी भी व्यक्ति के निजी दावे पर भरोसा करना खतरनाक साबित हो सकता है।

फिलहाल पुलिस जांच जारी है और पीड़ित युवकों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया गया है। यह देखना अहम होगा कि जांच के बाद इस बड़े फर्जीवाड़े में शामिल सभी आरोपियों पर कब और कैसी कार्रवाई होती है।

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