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मढ़ौरा में प्रसव त्रासदी: नवजात और मां की मौत, निजी नर्सिंग होम की लापरवाही उजागर

January 25, 20261 Mins Read
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सारण जिले के मढ़ौरा में स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियों ने एक दर्दनाक घटना के जरिए जनता के सामने अपना चेहरा दिखा दिया है। यहां एक निजी नर्सिंग होम में प्रसव के दौरान नवजात शिशु की मौत होने के साथ ही प्रसूता की भी मौत हो गई, जिससे न केवल परिजनों की दुनिया उजड़ गई, बल्कि स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र की व्यवस्थागत कमजोरियों पर भी गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

घटना तरैया थाना क्षेत्र के भटौरा गांव की 30 वर्षीय तारामुन्नी देवी के परिवार के साथ हुई। उनके पति संदीप शर्मा के अनुसार, प्रसव पीड़ा शुरू होने पर उन्होंने अपनी पत्नी को मढ़ौरा के सरकारी रेफरल अस्पताल में भर्ती कराया। परिजनों का आरोप है कि वहां मौजूद आशा कार्यकर्ता ने सरकारी अस्पताल के प्रभारी चिकित्सक के साथ मिलीभगत कर उन्हें बहला-फुसलाकर निजी नर्सिंग होम में भेज दिया।

तारामुन्नी देवी को इसके बाद मढ़ौरा मुख्यालय के स्टेशन माल गोदाम रोड स्थित आरपीसी नामक निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया। परिजनों ने बताया कि अस्पताल में उस समय न तो कोई योग्य चिकित्सक मौजूद था और न ही आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध थीं। प्रारंभ में कर्मियों ने स्थिति सामान्य बताई, लेकिन असलियत में प्रसव के दौरान गंभीर लापरवाही सामने आई।

परिजनों के अनुसार, प्रसव से ठीक पहले नवजात शिशु की मौत हो गई। इसके बाद महिला की हालत तेजी से बिगड़ने लगी, लेकिन अस्पताल कर्मियों ने समय पर उचित इलाज मुहैया नहीं कराया। मृतका के पति संदीप शर्मा का आरोप है कि अस्पताल कर्मियों ने बच्चे की मौत के बाद आनन-फानन में एंबुलेंस बुलाया और उन्हें बताया कि प्रसूता को छपरा सदर अस्पताल रेफर किया जा रहा है।

दुर्भाग्यवश, रास्ते में ही मिर्जापुर बाजार के पास प्रसूता तारामुन्नी देवी की मौत हो गई। परिजन निजी नर्सिंग होम पहुंचे तो देखा कि अस्पताल का संचालक और संबंधित चिकित्सक पहले ही फरार हो चुके थे। परिजन घंटों तक शव के साथ अस्पताल परिसर में बैठे रहे और चिकित्सक के आने का इंतजार करते रहे, लेकिन कोई भी मौके पर नहीं आया।

इस घटना ने स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया। नर्सिंग होम के बाहर बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए और संचालक व चिकित्सकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी अस्पतालों से निजी नर्सिंग होम की ओर मरीजों को मोड़ने की यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। इसमें कुछ आशा कार्यकर्ताओं और चिकित्सकों की मिलीभगत की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की कमजोर निगरानी के कारण निजी नर्सिंग होम बेलगाम हो चुके हैं।

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, आरपीसी नर्सिंग होम नियमों के विरुद्ध संचालित किया जा रहा था। नर्सिंग होम के संचालक डॉ. आर.एन. तिवारी अक्सर अस्पताल में मौजूद नहीं रहते थे और संचालन कर्मचारियों पर छोड़ दिया गया था। अपर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन सुविधाओं का अभाव और योग्य चिकित्सकों की अनुपस्थिति ने मरीजों के लिए स्थिति को जानलेवा बना दिया।

यह कोई पहली घटना नहीं है। मढ़ौरा और आसपास के क्षेत्रों में पहले भी सरकारी स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और निजी नर्सिंग होम की अव्यवस्था के कारण कई घातक मामले सामने आए हैं। हालांकि बार-बार शिकायतों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने ठोस कदम नहीं उठाए, जिससे यह समस्या और गंभीर हो गई है।

स्थानीय लोगों ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। घटना की सूचना मिलने पर 112 पुलिस मौके पर आई, लेकिन लोगों का आरोप है कि पुलिस ने न तो गहन पूछताछ की और न ही कोई ठोस कार्रवाई की। कुछ ही देर में पुलिस बैरंग लौट गई। लोगों का कहना है कि जब तक दोषी चिकित्सकों और अवैध रूप से संचालित निजी नर्सिंग होम पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाती, तब तक इस तरह की दर्दनाक घटनाओं का सिलसिला जारी रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि मढ़ौरा जैसी छोटी औद्योगिक नगरियों में सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की कमजोर स्थिति और निजी नर्सिंग होम की लापरवाही से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर बढ़ने की आशंका रहती है। सरकारी अस्पतालों में संसाधनों की कमी, चिकित्सकों की अनुपलब्धता और मरीजों को निजी क्लीनिक की ओर भेजने की प्रवृत्ति इस समस्या को और गहरा देती है।

सारण जिले में स्वास्थ्य व्यवस्था की यह त्रासदी एक बार फिर से यह दर्शाती है कि सरकारी निगरानी की कमी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों की अव्यवस्था किस हद तक जानलेवा साबित हो सकती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब स्वास्थ्य विभाग को तत्काल जांच कर दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदी दोहराई न जाए।

इस घटना ने यह भी सवाल खड़ा कर दिया है कि निजी नर्सिंग होम और सरकारी अस्पतालों के बीच कथित गठजोड़ किस हद तक मरीजों की जान जोखिम में डाल रहा है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ है कि सरकारी अस्पतालों की अपूरणीय कमियों और निजी नर्सिंग होम की लापरवाही के कारण गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं।

अंततः, मढ़ौरा की यह दर्दनाक घटना सिर्फ एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह पूरे जिले और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त गंभीर समस्याओं की गवाही भी है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में और भी मातृ और शिशु मृत्यु की घटनाएं बढ़ सकती हैं।

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