बीघापुर (उन्नाव)।
अपराध जगत में अक्सर कहा जाता है कि कातिल कितना भी शातिर क्यों न हो, वह कोई न कोई सुराग छोड़ ही देता है। उन्नाव के बिहार थाना क्षेत्र में रविवार को जो हुआ, वह इस कहावत को सच साबित करता है, लेकिन जिस कीमत पर यह सच सामने आया, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया। एक 11 साल का अबोध बालक, जो जीवन के मायने भी ठीक से नहीं जानता था, एक बीएससी पास युवक की हवस का शिकार बन गया। यह कहानी सिर्फ एक हत्या की नहीं, बल्कि उस सामाजिक पतन की है जहां पड़ोसी का धर्म और शिक्षा का महत्व, दोनों एक ही झटके में तार-तार हो गए।

लापता बचपन और अनहोनी की आहट
रविवार की दोपहर ग्रामीण अंचल में आमतौर पर सुस्ती भरी होती है, लेकिन कक्षा चार में पढ़ने वाले उस 11 वर्षीय छात्र के घर में शाम होते-होते कोहराम मच गया। दोपहर के वक्त वह खेलने के लिए घर से निकला था। माता-पिता निश्चिंत थे कि बेटा गांव में ही दोस्तों के साथ होगा। लेकिन जब सूरज ढल गया और अंधेरा अपने पांव पसारने लगा, तब परिवार की धड़कनें बढ़ने लगीं।
मां की पुकार और पिता की तलाश जब नाकाम साबित हुई, तब गांव वालों ने एक अहम जानकारी साझा की। किसी ने बताया कि दोपहर के वक्त बच्चे को पड़ोस के ही युवक, जयकुश उर्फ शैलेष शुक्ला के साथ बाइक पर देखा गया था। यह सूचना मिलते ही मामला ‘गुमशुदगी’ से ‘अपहरण’ की आशंका की ओर मुड़ गया। जयकुश गांव का ही रहने वाला था और बीएससी का छात्र था, इसलिए शुरुआत में किसी को यह विश्वास नहीं हुआ कि एक पढ़ा-लिखा लड़का ऐसा कुछ कर सकता है।
आरोपी की वापसी और पुलिसिया ‘थर्ड डिग्री’
रविवार देर शाम जयकुश घर लौटा, लेकिन अकेला। उसकी बाइक पर वह मासूम नहीं था जो उसके साथ गया था। जब परिजनों ने उससे कड़ाई से पूछा, तो वह कहानियां गढ़ने लगा। कभी कहता कि उसने बच्चे को वहीं छोड़ दिया था, तो कभी कहता कि उसे कुछ नहीं पता। उसके चेहरे का पसीना और बातों में लड़खड़ाहट साफ बता रही थी कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
मृतक के पिता ने तुरंत बिहार थाने के एसओ राहुल सिंह को सूचना दी। पुलिस ने बिना वक्त गंवाए जयकुश को हिरासत में ले लिया। थाने लाकर जब पूछताछ शुरू हुई, तो जयकुश पुलिस को भी अपनी पढ़ाई और सीधेपन का हवाला देकर गुमराह करने की कोशिश करता रहा। लेकिन पुलिस की निगाहें अपराधी की जुबान से ज्यादा उसके हाव-भाव और सबूतों पर होती हैं।
जांच के दौरान एक ऐसा मोड़ आया जिसने पुलिस के शक को यकीन में बदल दिया। एसओ राहुल सिंह और उनकी टीम ने गौर किया कि आरोपी जयकुश की पैंट पर कुछ अजीब दाग (धब्बे) लगे थे। फॉरेंसिक दृष्टि से यह ‘सीमेन’ (वीर्य) के दाग प्रतीत हो रहे थे। यह एक वैज्ञानिक सबूत था जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था। जैसे ही पुलिस ने सख्ती दिखाई और उन दागों का सच पूछा, बीएससी का यह छात्र टूट गया।
हैवानियत की दास्तां: आरोपी की जुबानी
पुलिस की कड़ाई के सामने जयकुश ने जो कबूलनामा दिया, वह किसी भी पत्थर दिल इंसान को भी पिघलाने के लिए काफी था। उसने बताया कि वह बच्चे को बहला-फुसलाकर बाइक पर घुमाने के बहाने ले गया था। उसकी नीयत पहले से ही खराब थी। वह उसे गांव के बाहर एक सुनसान इलाके में ले गया।
वहां उसने 11 साल के उस मासूम के साथ जबरन दुष्कर्म (कुकर्म) किया। बच्चे की चीखें उस सन्नाटे में दब गईं। अपनी हवस पूरी करने के बाद जब उसे लगा कि बच्चा घर जाकर सब बता देगा, तो डर उसके ऊपर हावी हो गया। पकड़े जाने के डर से उसने वह किया, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसने अपने ही पड़ोसी के उस बच्चे का मुंह और नाक तब तक जोर से दबाए रखा, जब तक कि उसके शरीर की हरकत बंद नहीं हो गई।
दरिंदगी यहीं खत्म नहीं हुई। हत्या के बाद लाश को ठिकाने लगाने के लिए उसने उसी खेत को चुना जो बच्चे के परिवार का था। उसने शव को मृतक के सरसों के खेत में फेंक दिया, ताकि यह लगे कि बच्चा शायद वहीं खेल रहा था और कुछ हादसा हो गया, या फिर लाश घनी फसल में छिप जाए।
खेत में मिली लाश और पोस्टमार्टम के रोंगटे खड़े करने वाले सच
पुलिस आरोपी को लेकर मौके पर पहुंची। वहां पीली सरसों के बीच बच्चे का शव पड़ा मिला। यह दृश्य देखकर साथ आए परिजनों की चीत्कार से आसमान गूंज उठा। पुलिस ने शव को कब्जे में लिया और अगले दिन, यानी सोमवार को पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू हुई।
चूंकि मामला अत्यंत संवेदनशील और ‘पॉक्सो’ (POCSO) से जुड़ा था, इसलिए पोस्टमार्टम के लिए एक विशेष पैनल गठित किया गया। इसमें सीएचसी मियागंज के डॉ. उमर फारुख और सीएचसी हसनगंज के डॉ. रोहित सिंह शामिल थे। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराई गई ताकि अदालत में सबूतों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने आरोपी की क्रूरता की हर हद को उजागर कर दिया। रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि बच्चे की मौत दम घुटने (Asphyxiation) से हुई थी, क्योंकि उसका मुंह और नाक बुरी तरह दबाया गया था। लेकिन, सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह था कि डॉक्टरों को बच्चे के साथ अप्राकृतिक दुष्कर्म के पुख्ता प्रमाण मिले। मृतक के मुंह में भी सीमेन पाया गया, जो यह दर्शाता है कि हत्या से पहले उसे किस कदर प्रताड़ित किया गया था। डॉक्टरों ने सीमेन और अन्य जैविक साक्ष्यों की दो स्लाइड तैयार कीं, जो अब इस केस में आरोपी को फांसी के फंदे तक पहुंचाने में सबसे बड़ा हथियार साबित होंगी।
सामाजिक आक्रोश और कानूनी शिकंजा
इस घटना ने पूरे क्षेत्र में उबाल ला दिया है। एक तरफ मां-बाप का रो-रोकर बुरा हाल है, जो अपने छोटे बेटे को खो चुके हैं, तो दूसरी तरफ गांव वाले इस बात से सन्न हैं कि आस्तीन का सांप उनके बीच ही पल रहा था। बीएससी की पढ़ाई करने वाला जयकुश, जिसे लोग भविष्य का एक जिम्मेदार नागरिक मान रहे थे, वह इतना घिनौना अपराधी निकलेगा, यह किसी ने नहीं सोचा था।
सीओ मधुपनाथ मिश्रा ने स्पष्ट किया है कि पुलिस ने इस मामले में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई है। मृतक के पिता की तहरीर पर आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की हत्या (302), अपहरण (364), साक्ष्य मिटाने (201) और अप्राकृतिक कृत्य (377) के साथ-साथ पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। आरोपी को जेल भेज दिया गया है।
पुलिस अब जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी में है। फॉरेंसिक रिपोर्ट और आरोपी की पैंट पर मिले दागों को मुख्य सबूत (Primary Evidence) माना जाएगा।
निष्कर्ष
उन्नाव के बीघापुर की यह घटना हमें बार-बार यह सोचने पर विवश करती है कि हम किस समाज का निर्माण कर रहे हैं। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होता है, लेकिन जयकुश जैसे उदाहरण बताते हैं कि डिग्री हासिल करना और इंसान बनना दो अलग बातें हैं। 11 साल का वह छात्र, जो शायद जीवन में बहुत कुछ बन सकता था, एक पड़ोसी की विकृत मानसिकता की भेंट चढ़ गया। अब न्याय की उम्मीद अदालत पर टिकी है, ताकि समाज को यह संदेश दिया जा सके कि बच्चों के खिलाफ ऐसे जघन्य अपराधों की सजा सिवाय ‘कठोरतम दंड’ के और कुछ नहीं हो सकती।







